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भारत की ऊर्जा सुरक्षा के खिलाफ जारी आंदोलन के पीछे क्या चीन समर्थित लॉबी का हाथ है?

भारत की ऊर्जा सुरक्षा के खिलाफ जारी आंदोलन के पीछे क्या चीन समर्थित लॉबी का हाथ है?

भारत और चीन दोनों देशों में, पिछले कुछ हफ्तों में कोयले की भारी कमी दर्ज की गई। हालांकि, जहां भारत तात्कालिक उपायों के जरिये ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में कामयाब रहा, वहीं चीन के आधे से अधिक हिस्से में विद्युत आपूर्ति की विफलता और बिजली कटौती देखी जा रही है।

त्योहारों का मौसम और सर्दियां शुरू होने वाली हैं, और इस दौरान भारत और चीन दोनों देशों में मैन्यूफैक्चर्ड वस्तुओं की भारी मांग रहेगी। हालांकि भारत में जहां ऊर्जा संकट या इसके दुष्प्रभाव मुश्किल से नाममात्र को ही दिखेंगे, वहीं गोल्डमानसैक्स का अनुमान है कि चीन की जीडीपी वृद्धि शून्य प्रतिशत रहेगी!

यह अंतरराष्ट्रीय ताकतों और अमित्र राष्ट्रों के हितों में काम करने वाले पैरवीकारों (लॉबिस्ट) के एक वर्ग के लिए अच्छा संकेत नहीं लगता है। उदाहरण के लिए, तथाकथित एक्टिविस्टों के एक समूह ने 2 अक्टूबर से विभिन्न राज्य कंपनियों की कोयला खदानों के विरोध में एक मार्च निकालने का फैसला किया है। चूंकि उनके पास कोई वैध तर्क नहीं है, इसलिए पैरवीकार पर्यावरण का नाम ले रहे हैं! उनका दावा है कि छत्तीसगढ़ में प्रस्तावित कोयला खदानों से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ेगा।

दिलचस्प बात यह है कि इन पैरवीकारों ने दशकों से केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली बड़ी कोयला खनन कंपनियों को अनुमति दी है, लेकिन अब वे राज्य सरकार की बिजली कंपनियों का विरोध कर रहे हैं जो केवल बिजली की निरंतर उपलब्धता के लिए ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं। इसके अलावा, ये पैरवीकार केंद्र और छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा एक साथ कई कोयला खदानों की पहचान किए जाने के बाद भी वर्षों तक चुप्पी साधे रहे। पर अब वे भारत की उन योजनाओं को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे बिजली की कमी से प्रभावी ढंग से निपटने का प्रयास हो रहा है। यह अमित्र चीन को दुनिया के सामने यह दिखाने का अवसर प्रदान करेगा कि भारत भी बिजली की कमी से जूझ रहा है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट्स भारत में स्थानांतरित नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, पैरवीकार झगडे के लिए तैयार रहने वाले चीन के मुकाबले भारत को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह सब इस तथ्य के बावजूद हो रहा है कि चीन दुनिया का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता रहा है और वह भी बिना किसी जिम्मेदारी या जवाबदेही के। चीन की राजधानी बीजिंग और अन्य बड़े शहरों ने पिछले कुछ वर्षों में चरम सर्दियों के मौसम में धुंध की मोटी चादर के कारण अनचाहा ध्यान आकर्षित किया है। इसके अलावा, चीन दुनिया की मैन्यूफैक्चरिंग राजधानी होने के अपनी पहचान को खोना नहीं चाहता, जिसको लेकर उसे पहले से ही भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है। कई अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट ने आज अपने ठिकानों को चीन से भारत में स्थानांतरित करने की इच्छा जताई है, जिससे चीन काफी चिंतित हैं।

इस बीच, दुनिया में सबसे बड़े कोयला भंडार वाला देश, भारत जिम्मेदार खनन के जरिये ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार अग्रसर है, ताकि वह न केवल अपनी घरेलू जरूरतों के लिए, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्रों के लिए भी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। हालांकि, निहित स्वार्थों से ग्रसित एक्टिविस्ट भारतीय संदर्भ में इसके महत्व की जांच किए बिना कोयला खनन क्षेत्र का विरोध कर रहे हैं। कहना न होगा कि भारतीय खनन क्षेत्र करों, शुल्कों और विशाल बहुसंख्यक आबादी के लिए रोजगार के अवसरों के जरिये महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। इसके साथ ही, मजबूत और सशक्त कानूनी एवं नियामक ढांचे ने खनन क्षेत्र को बेहतर और जिम्मेदारी के साथ प्रदर्शन करने के लिए बाध्य किया है।

अगर निहित स्वार्थों वाले भारतीय एक्टिविस्टों को उकसाने की चीनी चाल सफल होती है, तो हमें या तो अंधकार युग में रहना पड़ेगा या कोयले के आयात पर अपनी निर्भरता बढ़ानी होगी, जो आत्मनिर्भरता के हमारे आह्वान और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों के लिए एक बड़ा झटका साबित होगा।

इसके अलावा, चीन ने अपने सत्तावादी शासन के अंतर्गत उत्सर्जन मानकों पर किसी भी विश्वसनीय जांच के बिना बिजली उत्पादन करने का फैसला किया, जबकि इसके विपरीत भारत के पास पहले से ही ऐसे मुद्दों से निपटने के लिए एक ठोस एवं मजबूत प्रणाली है। भारत में कई अधिकार प्राप्त संस्थाएं हैं जिनका एकमात्र काम यह सुनिश्चित करना है कि बिजली उत्पादक, पारिस्थितिकी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं और कचरे का निपटारा जिम्मेदार और निर्धारित तरीके से किया जाता है।

हमें भारत की तुलना में विकसित देशों द्वारा समग्र ऊर्जा खपत से संबंधित कुछ प्रमुख तथ्यों पर भी विचार करना चाहिए। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि प्रति व्यक्ति वैश्विक बिजली खपत 3081 यूनिट है। अमेरिका और चीन में, जो बिजली के सबसे बड़े उत्पादकों और उपभोक्ताओं में से एक हैं, औसत वार्षिक खपत क्रमशः 12,154 यूनिट और 5312 यूनिट है। जबकि दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश, भारत में प्रति व्यक्ति बिजली खपत केवल 935 यूनिट है। इसलिए हमें भारत के 138 करोड़ लोगों के जीवन स्तर में सुधार के लिए, अधिकतम मांग को पूरा करने और बिजली उपलब्धता बढ़ाने के लिए कोयले के महत्व को समझना चाहिए।

यह बताने की जरूरत नहीं है कि भारत ने इस बीच रिन्यूएबल एनर्जी पैदा करने के लिए बहुत ही उच्च और महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इसने अपनी आबादी और अर्थव्यवस्था के लिए पारंपरिक ऊर्जा और रिन्यूएबल एनर्जी के बीच संतुलन बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और इसका लक्ष्य जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता को कम करना है।
अंतिम, लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कोयले को उन राष्ट्रों द्वारा एक बुरे ईंधन के रूप में चिह्नित किया गया है जो राष्ट्र वर्षों से ही नहीं, बल्कि दशकों और सदियों से कोयले के गैर-जिम्मेदार खपत के कारण ही विकसित हुए हैं। आज ये देश भारत जैसे विकासशील देशों को कोयले से दूर रहने के लिए मजबूर कर रहे हैं और उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदमों को मान्यता देने को भी तैयार नहीं हैं। पूरी दुनिया और भारत में चीन और उसके पैरवीकारों द्वारा अपनाई जा रहीं चालें हमारे विकास इंजन को पटरी से उतारने का एक और प्रयास है।

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